Monday, 8 December 2014

कुछ दिखा क्या ?

मेरी डूबी हुई नाव को और डूबाने वालों 
ज़रा देखो गौर से कितने तूफ़ान मेरी बाहों में ही पले बढ़े हैं, 
उसे बहार निकालने  को तू नहीं चाहिए बुज़दिल 
वो तूफ़ान  ही मजबूती से इसे कंधा दे रहें हैं 

मेरी चोटों पे हसने वालों 
मुड़कर ज़रा गौर से देखो ,
आज मरहम लगाने वाले 
मेरी चौखट पे कईं  खड़े हैं 

बाप के  पैसों पे उछलने वाले 
ओ बदकिरदार ,
देख , देख मुड़कर 
आज तेरी शान को कुचलते हुए 
हम खुशिओं के घर बना  रहें हैं !


मेरी साँसों को थामने का ज़ज्बा रखते हुए 
ऐ कातिल 
मुड़कर देख तू ज़रा 
तेरी आखिरी साँसों का हम जश्न मना  रहे हैं 

नर्क में भी तुझे जगह न मिले 
हम साथ में वो गीत गुनगुना रहें हैं !!







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