मैं ज़िंदा तो हूँ पर
ज़िंदादिली सी नहीं लगती।
कोई खोता है किसी को
जब कोई मर जाता है ,
मैने तो ज़िंदा ही
खुदको मार दिया
खो दिया इस दुनिया में खुदको
जीतेजी अपनी साँसों को रोक दिया
आज यूँ तो वो सामने से गुज़रते हैं
एहसास मेरे मन में वही उठते हैं ,
पर क्या ख़ूब ज़िन्दगी देखने को मिल रही है
उसकी छाया भी मेरे वजूद को कुचल रही है
वो जिंदा हैं, खुश हैं
और मेरी हर एक साँस
मेरे लिए बेड़ियाँ बना रहीं हैं ,
मैं बुनता जा रहा हूँ एक जाल कोई ऐसा
जिसका रास्ता ही नहीं सुलझने का ,
हर उस मोड़ पर खुदको अकेला पा रहा हूँ
कभी साथ जिनपे रहता था उनका
क्या तमाशे देखने को मिल रहे हैं
कभी जिनपे हँसा करते थे ,
आज वही रुला रहे हैं
ये वक़्त के अंदाज़ भी निराले हैं
कभी जो साँस दे जाते थे
आज वही इसे थामने की बात करते हैं ,
मेरी हर चोट से जो काँप जाते थे
आज वही हर झकम हरा कर जाते हैं ,
कसूर शायद उनका भी नहीं
ये दौर ही कुछ ऐसा है
जब
मैं ज़िंदा तो हूँ पर
ज़िंदादिली सी नहीं लगती।
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