जिस दिन लफ़्ज़ों से नकाब उतर जायेगा
शायद हर अक्षर लज्जा से मर जाएगा ,
यूँ तो कुछ कहने की आदत नहीं मुझे
पर लिख दिया तो खून के आंसू कलम बहाएगा ,
हर तस्वीर को जिसे मैने सोचा है
रिश्तों को जिस धागे में पिरोया है,
वो काँप कर , डगमगा कर
खुद चूर-चूर भिखर जायेगा ,
मेरे लाख सिलने पर भी
तितर-भितर हो जाएगा ,
जुड़ना ना चाहेगा अक्षर वो
उम्मीद ऐसी खो जायेगा,
टूट-टूट ही था जुड़ना सीखा जिसने
वो ज़िंदा खुदखुशी कर जाएगा,
कलम तो चलती रहेगी परन्तु
अक्षर फ़ीका पड़ जाएगा !!
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