Saturday, 31 January 2015

फ़ीकापन

जिस दिन लफ़्ज़ों से नकाब उतर जायेगा 
शायद हर अक्षर  लज्जा से मर जाएगा ,

यूँ तो कुछ कहने की आदत नहीं मुझे 
पर लिख दिया तो खून के आंसू कलम बहाएगा ,

 हर तस्वीर  को जिसे मैने सोचा है
रिश्तों को जिस धागे में पिरोया है,
वो काँप  कर , डगमगा कर 
खुद  चूर-चूर भिखर जायेगा ,


मेरे लाख सिलने पर भी  
तितर-भितर हो जाएगा ,
जुड़ना ना चाहेगा अक्षर वो 
उम्मीद ऐसी खो जायेगा,

टूट-टूट ही था जुड़ना सीखा जिसने 
वो ज़िंदा खुदखुशी कर जाएगा,
कलम तो  चलती रहेगी  परन्तु 
अक्षर फ़ीका पड़ जाएगा !!


No comments: