Monday, 8 December 2014

कुछ दिखा क्या ?

मेरी डूबी हुई नाव को और डूबाने वालों 
ज़रा देखो गौर से कितने तूफ़ान मेरी बाहों में ही पले बढ़े हैं, 
उसे बहार निकालने  को तू नहीं चाहिए बुज़दिल 
वो तूफ़ान  ही मजबूती से इसे कंधा दे रहें हैं 

मेरी चोटों पे हसने वालों 
मुड़कर ज़रा गौर से देखो ,
आज मरहम लगाने वाले 
मेरी चौखट पे कईं  खड़े हैं 

बाप के  पैसों पे उछलने वाले 
ओ बदकिरदार ,
देख , देख मुड़कर 
आज तेरी शान को कुचलते हुए 
हम खुशिओं के घर बना  रहें हैं !


मेरी साँसों को थामने का ज़ज्बा रखते हुए 
ऐ कातिल 
मुड़कर देख तू ज़रा 
तेरी आखिरी साँसों का हम जश्न मना  रहे हैं 

नर्क में भी तुझे जगह न मिले 
हम साथ में वो गीत गुनगुना रहें हैं !!







किसे कोसूँ

मैं ज़िंदा तो हूँ पर 
ज़िंदादिली सी नहीं लगती। 

कोई  खोता है किसी को 
जब कोई मर जाता है ,
मैने तो ज़िंदा ही 
खुदको मार दिया 

खो दिया इस दुनिया में खुदको 
जीतेजी अपनी साँसों  को  रोक दिया  

आज  यूँ तो वो सामने से गुज़रते हैं 
एहसास मेरे मन में वही उठते हैं ,

पर क्या ख़ूब ज़िन्दगी देखने को मिल रही है 
उसकी छाया भी मेरे वजूद को कुचल रही है 

वो जिंदा हैं, खुश हैं 
और मेरी हर एक साँस 
मेरे लिए बेड़ियाँ बना  रहीं हैं ,

मैं बुनता जा रहा हूँ एक जाल कोई ऐसा 
जिसका रास्ता ही नहीं सुलझने का ,
हर  उस मोड़ पर खुदको अकेला पा रहा हूँ 
कभी साथ जिनपे रहता था उनका 

क्या तमाशे देखने को मिल रहे हैं 
कभी जिनपे हँसा करते थे ,
आज वही रुला रहे हैं 

ये वक़्त के अंदाज़ भी निराले हैं
कभी जो साँस दे जाते थे
आज वही इसे थामने की बात करते हैं  ,

मेरी हर चोट से जो काँप जाते थे 
आज वही हर झकम हरा कर जाते  हैं ,


कसूर शायद उनका भी नहीं 
ये दौर ही कुछ ऐसा है 

जब 

मैं ज़िंदा तो हूँ पर 
ज़िंदादिली सी नहीं लगती।