Sunday, 6 April 2014

बह गया वक़्त

पिरो रहे थे लमहों को
जब धागों में यादों के

तब लमहों को थमना नहीं था
ज़िंदा रहना था अल्फ़ाज़ों को

क्यूँ आगया वक्त ऐसा
न रह पाया जो कल जैसा

कैसे लगने लगा वो कम
साँसों में ज़िन्दगी जो देता था
छूट गयी वो आँखें नम
प्यार का आइना जिनमें रहता था

काया पलट गई
इधर उधर यादें बिखर गई,

हर लमहा जो निकलता रहा
दर्द सीने में बढ़ाता गया,
फिर भी किसी कोने में दिल अपने
घर यादों का सजाता गया

भूलकर न भूले
वो लमहे सुहाने थे
वक़्त का दोष नहीं
किस्से खोखले ही पड़ जाने थे ||

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