Sunday, 6 April 2014

बेहिसाब ज़ज्बात

खोकर तुझे पाने से पेहेले
हम चल पड़े यूँ ही अकेले          

मेरी हिम्मत नहीं है कहने की
तेरे साथ अब दो पल रहने की

मुझे खत्म तो करना न था
पर आगे दृश्य धुंधला ही था

अश्क़ों को इन बहने दूँ
सागर भर मैं आज रो लूँ

हमदर्दी की तेरी चददर कंधे से हटा 
न सोचके क्यूँ मेरे हिस्से का प्यार बँटा

मैं चलता रहूँ रफ़्तार से
झूठी मुस्कान पहन कर

रिश्ते की माला तोड़ कर
उस धागे को छुपाकर सबसे

मुड़ न चाहूँ, मुड़ूँगा पीछे
घबराऊँगा न यादें बुलाने से
तेरे साथ क पलों को खोउंगा नहीं
खो जाउंगा सोच तेरी भोली आँखों में

तू जब-जब याद आएगी
मेरे दिल में कही तेरी बात घर कर जाएगी
मेरे जीने का सहारा
मेरे सपने नहीं, तेरी यादें ही बन पाएंगी ||

बह गया वक़्त

पिरो रहे थे लमहों को
जब धागों में यादों के

तब लमहों को थमना नहीं था
ज़िंदा रहना था अल्फ़ाज़ों को

क्यूँ आगया वक्त ऐसा
न रह पाया जो कल जैसा

कैसे लगने लगा वो कम
साँसों में ज़िन्दगी जो देता था
छूट गयी वो आँखें नम
प्यार का आइना जिनमें रहता था

काया पलट गई
इधर उधर यादें बिखर गई,

हर लमहा जो निकलता रहा
दर्द सीने में बढ़ाता गया,
फिर भी किसी कोने में दिल अपने
घर यादों का सजाता गया

भूलकर न भूले
वो लमहे सुहाने थे
वक़्त का दोष नहीं
किस्से खोखले ही पड़ जाने थे ||