Friday, 21 March 2014

गुफ़्तगू अंधेरों से

बुझ गया दिया अभी
जिसने जलना सीखा ही था,
लौ ने जिसके दिए के
तेल में तैरके भीगा ही था । 

माचिस की तीली की चोट
अंग-अंग पे ऐसे लगी,
बहार निकलती हुई चोंच
अंदर खुद में सीमटती रही । 

रौशनी कि गुफ्तगू 
अँधेरे से शुरू हुई थी,
अँधेरे कि आहट से लेकिन
उम्मीद जलने कि छूट गयी थी । 

प्रकाश कुछ पलों का था
आइना गन्दा सा था,
धुल साफ़ करने क लिए
कपड़ा नहीं कोई मिला पड़ा वहाँ । 

वो कुछ पलों कि रोशनी भिखेरके जलता गया
मुस्कुरा के मुह चिढ़ा के
अँधेरे की खिल्ली उड़ा गया,

वो बुझ गया पल में मगर
वो जब तक जलता रहा,
थी रोशनी से हवाएं खिलखिलारही
जब उजाले के गीत वो गाता गया । 

बुझ गया दिया अभी
जिस्ने जलना सीखा ही था
लौ ने जिसकी जगमगाना
प्रेम करना सीखा  ही था ||







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