Thursday, 27 March 2014

काश...

कोई तो होता जिसे अपनी ज़िन्दगी कह सकते
जिसके साथ मिल खालीपन को बाँट सकते,
सह सकते हर चोट को अपने हिस्से की 
बाँट सकते हर कहानी पुराने किस्सों की |

जिसके लिए मेरी मुस्कुराहट माएने रखती
मेरे आसुओं की वजहों  से जिसे शिकायतें रहती,

कोई तो होता जिसे सुबह उठ मेरा ध्यान आता
जिसके दिमाग व लबों पे कुछ सुनकर मेरा नाम आता,
जिसके दिन की शुरुआत मुझसे होती
बात यहीं पे नहीं,
सोने से पेहेले मेरे ख्याल पे ही खत्म होती |

काश बना लेता कोई छोटी सी दुनिया मेरे साथ भी
कह सकती जिससे दिल के मैं हर जज़्बात  भी..

कोई तो होता जिसे  मेरी बातें लुभाती
जिसकी ज़िन्दगी में मैं महत्वपूर्ण जगह बना पाती,
डांट फटकार कर मुझे अगर मन करदेता कोई
उसकी डांट सुनकर भी उसके ही सीने से चिपक कर होती रोई|

मुददत सी हो गयी इन्तजार करते - करते
ख्वाबों के दिये दिल  में जलाए रखे,
अब तो लगता ही नहीं की कोई ऐसा बना होगा
जो मेरे लिए मानो मेरा खुदा होगा|

बीत जाएगा ये सफ़र कुछ इस तरह अकेले
की थम जाएगी साँसे तब दीदार उनका होगा,
छू लेगा मेरी रूह को वो
तब शायद मुझे अपनी मौत से ही प्यार होगा ||





Friday, 21 March 2014

गुफ़्तगू अंधेरों से

बुझ गया दिया अभी
जिसने जलना सीखा ही था,
लौ ने जिसके दिए के
तेल में तैरके भीगा ही था । 

माचिस की तीली की चोट
अंग-अंग पे ऐसे लगी,
बहार निकलती हुई चोंच
अंदर खुद में सीमटती रही । 

रौशनी कि गुफ्तगू 
अँधेरे से शुरू हुई थी,
अँधेरे कि आहट से लेकिन
उम्मीद जलने कि छूट गयी थी । 

प्रकाश कुछ पलों का था
आइना गन्दा सा था,
धुल साफ़ करने क लिए
कपड़ा नहीं कोई मिला पड़ा वहाँ । 

वो कुछ पलों कि रोशनी भिखेरके जलता गया
मुस्कुरा के मुह चिढ़ा के
अँधेरे की खिल्ली उड़ा गया,

वो बुझ गया पल में मगर
वो जब तक जलता रहा,
थी रोशनी से हवाएं खिलखिलारही
जब उजाले के गीत वो गाता गया । 

बुझ गया दिया अभी
जिस्ने जलना सीखा ही था
लौ ने जिसकी जगमगाना
प्रेम करना सीखा  ही था ||