इन सूनी - सूनी रातों में कोई आहट मुझसे कहती है
भीड़ में भी क्यों तू इतनी तन्हा रहती है ,
एक बार तो ए पागल तू भी ज़िन्दगी का मीठा रस पी
ना आने दे अश्कों को आँखों में , हर ख़ुशी को तू मन से जी ,
करना सीख सामना उनका जिन्होंने तनहा छोड़ा तुझको
तू दिखा दे दुनिया को है हसने के पल बाकी अभी कुछ तो ,
फिर कर इन्तेजार उस सुबह का जब सूरज पाश्चिम से निकल जाएगा
तेरी ज़िन्दगी का हर एक गम उस शाम उसके साथ ढल जाएगा ,
उस आहट के ऐसा कहने पे आँखे मेरी भी चौकी
पर फिर भी मन में एक नई उम्मीद, एक नई उम्मीद की लौ जली ,
क्या जाता है एक बार ज़िन्दगी को आजमाने में
होगा एक दिन भी तो ऐसा जो न होगा हर एक दिन के जैसा,
उस एक दिन के लिए जी लूँगी मै हर पल को
भूल के सारे कांटो को ,
ठोकर से भरे रास्तों को
उस एक दिन के लिए जी लूँगी मै हर पल को ।
भीड़ में भी क्यों तू इतनी तन्हा रहती है ,
एक बार तो ए पागल तू भी ज़िन्दगी का मीठा रस पी
ना आने दे अश्कों को आँखों में , हर ख़ुशी को तू मन से जी ,
करना सीख सामना उनका जिन्होंने तनहा छोड़ा तुझको
तू दिखा दे दुनिया को है हसने के पल बाकी अभी कुछ तो ,
फिर कर इन्तेजार उस सुबह का जब सूरज पाश्चिम से निकल जाएगा
तेरी ज़िन्दगी का हर एक गम उस शाम उसके साथ ढल जाएगा ,
उस आहट के ऐसा कहने पे आँखे मेरी भी चौकी
पर फिर भी मन में एक नई उम्मीद, एक नई उम्मीद की लौ जली ,
क्या जाता है एक बार ज़िन्दगी को आजमाने में
होगा एक दिन भी तो ऐसा जो न होगा हर एक दिन के जैसा,
उस एक दिन के लिए जी लूँगी मै हर पल को
भूल के सारे कांटो को ,
ठोकर से भरे रास्तों को
उस एक दिन के लिए जी लूँगी मै हर पल को ।
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