Monday, 9 September 2013

Bebasi (बेबसी )

इन  सूनी - सूनी   रातों  में  कोई  आहट  मुझसे  कहती  है
भीड़  में  भी  क्यों  तू  इतनी  तन्हा  रहती है ,

एक  बार  तो  ए  पागल तू  भी  ज़िन्दगी  का  मीठा  रस   पी
ना  आने  दे   अश्कों  को  आँखों में , हर ख़ुशी को तू मन से जी ,

करना  सीख  सामना उनका जिन्होंने  तनहा छोड़ा तुझको
तू दिखा दे  दुनिया को है हसने  के पल  बाकी अभी कुछ तो ,

फिर कर इन्तेजार उस सुबह का जब सूरज पाश्चिम  से  निकल  जाएगा
तेरी ज़िन्दगी का हर  एक गम उस शाम उसके  साथ ढल जाएगा ,

उस आहट  के ऐसा कहने पे आँखे  मेरी भी चौकी
पर फिर भी मन में एक नई  उम्मीद, एक नई  उम्मीद की  लौ जली ,

 क्या  जाता है एक बार ज़िन्दगी को आजमाने में
होगा एक दिन भी तो ऐसा जो न होगा हर एक दिन के  जैसा,


उस एक दिन के लिए जी  लूँगी  मै  हर पल को
भूल  के सारे कांटो को ,
ठोकर से भरे रास्तों  को
उस एक दिन के लिए जी  लूँगी  मै  हर पल को ।