Wednesday, 29 January 2014

Nirbhaya (निर्भया)

मेरे झकमों को देखकर हर देश का आदमी चौंका है 
फिर भी ना किसी ने आज इस हैवानियत को  रोका है,

है गर आक्रोश  इतना पलट दूँ आज दुनिया की काया को
कर दूँ ऐसे दरिंदों का खात्मा, उनकी रची हुई इस माया को  । 

होती अगर ना मैं  वो, होती मेरी जगह  तेरे घर की  स्त्री
क्या बैठा होता इतना चुप जितना  बेबस  है  तू  व्यक्ति अभी ?

सहम  जाती हूँ मैं आँखों को जब भी खोलती हूँ  
भूलना  चाहूँ जितना  भी ना उस भददे दृश्य को भूलती  हूँ । 

एक-एक अंग को कैसे उंन जानवरों ने ऐसे  नोचा है 
समझ  के कोई  खिलौना  मेरी हर साँस को झकझोड़ा है, 

दर्द से कर्राह रही , मदद कि भीख़ थी मांग रही 
उन निर्दयी  जानवरों से बचकर थी किसी तरह भाग रही ,

सिसक-सिसक थी रो रही रास्ते पे मैं पड़ी 
शर्म की चद्रदर ओढ़ने को हाथ फ़ैलाती रही 
क्युंकी ना पता था मुझको की सफ़ेद चददर ही पढ़ेगी ओढ़नी
ही पढ़ेगी ओढ़नी । ।