Tuesday, 5 November 2013

Paristithiyaan ( परिस्तिथियाँ )

 आरज़ू  है  मेरी  तुझे  पाने की
 कश्मकश  से बाहर निकल सिक्के के दोनों  पहलू  जी  जाने  की,

 गरदिश ने मेरी मुझे परे रखा उस वक़्त से
 जब  आरंभ हो रहा  था  हर ज़र्रे का मिलाना मुझे तुझसे ,

बचपंन  में जब  कभी  झाँक  कर देखा
अधूरेपन ने  सदैव  हमेशा  मेरा  मन कचोटा,

थे  शायद  मेरे  हिस्से में जब  हसने खेलने के दिन 
,तब परिश्रम करना पड़ रहा  था मुझे, जो था मुश्किल,

जब परिश्रम का अर्थ लिखना पढ़ना मेरे मित्रगण  का हुआ करता था 
मेरे  जीवन  का  अनमोल  हिस्सा  तब दो  पैसे  माँगने में  बीतता  था ,

किसमत में  शायद  मेरी  था  नहीं  कलम  पकड़ना 
तभी आज छुप  के  दीवारों  से  देखता हूँ  अपना  ही  सपना ,

सिक्के  के  दोनों  पहलुओं  से  परिचित तो  मैं अभी  भी  नहीं 
पर जिस  एक  पहलू  को जिया  उस्में  ज़िन्दगी का कड़वा रस ही पिया,

गुज़रता हुआ ये वक़्त बारिश कि बूंदो की  तरह  कुछ  समय  में  थम  जाएगा 
बचपन  के साथ  मेरा  आने  वाला  कल गरजता  हुआ  मुझपे  अनगिनत  झकम  कर   जाएगा,

कलम  पकड़ना  अफ़सोस  मेरा  स्वप्न  ही  रह  जाएगा
मेरे  स्वप्नों  की कल्पना  को  भसम कर जाएगा  | |